शनिवार, 16 नवंबर 2013

दरकते रिश्ते, बिखरते घर?

दरकते रिश्ते, बिखरते घर?

दरकते रिश्ते, बिखरते घर?

बाड़मेर। मासूम मोहन जिस मां के हाथों से बड़ा हुआ, उन्हीं हाथों से
उसी मां ने कुल्हाड़ी से उसकी गर्दन काट दी। मीरां ने जिस
पति को परमेश्वर माना, उसने उसे मौत के घाट उतार दिया। पपू
अपने पति द्वारा किए गए चाकू के वार से गंभीर घायल हो गई और
अब अस्पताल में कराह रही है। पिछले एक सप्ताह में बाड़मेर जिले मे
रिश्तों का इस कदर खून हुआ है कि रूह तक कांप जाती है।
विश्वास की डोर से बंधा पति-पत्नी का रिश्ता अविश्वास व
अतार्कितता के गहरे कुएं में डूबता जा रहा है, जिसका नतीजा यह
हो रहा है कि घर बिखर रहे हैं, मासूम अनाथ होते जा रहे हैं। दो मई
को गिड़ा थाना क्षेत्र के चीबी गांव में मांगीदेवी नाम की एक
महिला अपने परिवार के साथ तालमेल नहीं बिठा पाई। वह इस बात
से नाराज थी कि उसका पति अपनी मां (महिला की सास) के इलाज
पर रूपया क्यों खर्च कर रहा है। इस बात पर पति से उसकी अनबन
इस हद तक पहुंच गई कि उसने कुल्हाड़ी से अपनी मासूम बेटी व बेटे
को मारकर खुद मर जाने की ठान ली। बेटी बच गई, बेटा मारा गया,
वह खुद फंदे पर झूलकर संसार से विदा हो गई। इस तरह
पूरा परिवार बिखर गया।
आलमसर निवासी खमीशाराम को शादी के बीस वर्ष बाद
अपनी पत्नी के चरित्र पर संदेह हुआ और उसने उसे मौत के घाट
उतार दिया। इस परिवार के बच्चों को नहीं पता कि मां और बाबा के
बीच ऎसा क्या हो गया कि मां भगवान को प्यारी हो गई और
बाबा जेल की सलाखों के पीछे धर दिए गए। हालत यह है कि बच्चे
अनाथ हो गए और पूरा परिवार बिखर गया। रविवार दोपहर शहर के
शास्त्री नगर में पति ने पत्नी को चाकू मारकर मारने की कोशिश
भी आपसी अनबन व अविश्वास के चलते की। गनीमत रही कि वह
बच गई।
बढ़ रहे हैं ऎसे मामले
रिश्तों के खून से संबंधित मामलों की संख्या में निरंतर
बढ़ोतरी हो रही है। बाड़मेर में औसतन हरेक पखवाड़े में एकाध
ऎसी घटना हो जाती है कि मां अपने बच्चों के साथ टांके में कूद
जाती है अथवा पत्नी अपने प्रेमी के संग मिलकर पति की हत्या कर
देती है। दहेज प्रताड़ना के नाम पर घर उजड़ना अब पुरानी बात
हो गई है।
एकल परिवार है वजह
संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवार हो गए हैं। सहन शक्ति कम
हो गई हैं। छोटी समस्याएं बड़ा तनाव बनकर हादसे का रूप ले ले
रही है। रिश्तों का दायरा बढ़ाने की जरूरत है।
-राहुल बारहट मनहर्दन, पुलिस अधीक्षक, बाड़मेर
रिश्तों पर भारी स्वार्थ
व्यक्ति स्वकेन्द्रित (स्वार्थी) होता जा रहा है। स्वार्थ की जब
पूर्ति नहीं होती है तो तनाव उपजता है, जो कुण्ठा में बदलकर
आक्रोश का रूप ले लेता है। जिसके चलते ऎसी घटनाएं हो जाती है।
रिश्तों को निभाने के लिए त्याग की भावना जरूरी है, जो वर्तमान में
कम होती जा रही है। डॉ. ललिता मेहता (मनोविज्ञानी), प्रोफेसर

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