सिवानाउपखंड के खंडप कस्बे में प्रतिवर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष में तीन दिनों तक कस्बे का हर प्रवेश मार्ग बंद रहता है। भले ही दूर-दराज से आया कोई नाते-रिश्तेदार हो या फिर कस्बे का निवासी, कोई भी अपने वाहन कस्बे में प्रवेश नहीं करवा सकता।
दशकों से चली रही इस परंपरा का निर्वहन खंडप कस्बे में हर साल माघ मास के शुक्ल पक्ष में किसी एक रविवार से मंगलवार तक बड़ी आस्थापूर्वक होता है। इन तीन दिनों में कस्बे के सभी प्रवेश मार्ग बड़े-बड़े पत्थर कंटीली झाड़ियों से बंद कर दिए जाते हैं वाहन का प्रवेश गांव में वर्जित रहता है। इन तीन दिनों में रात्रि में कस्बे में स्थित हनुमानजी का मंदिर, नागाजी महाराज की बगीची रामदेव मंदिर पर भजन संध्या का आयोजन होता है, जिसमें सभी ग्रामीण बड़ी आस्था के साथ भाग लेते हैं। बुजुर्गों के अनुसार यह परंपरा कस्बे में करीब 90 से चल रही है। नागाजी महाराज के नाम से विख्यात जसरथगिरी महाराज के बताए मार्ग पर खंडप कस्बे के वाशिंदे आज भी चल रहे हैं।
परंपरा के पीछे की मान्यता कुछ ऐसी
ग्रामीणरामसिंह भाटी, नरेंद्रसिंह बालावत, बाबूलाल जोशी, मूलसिंह सोढ़ा, देवाराम, मदनसिंह भाटी आदि ने बताया कि दशकों से चली रही इस परंपरा के पीछे मान्यता यह है कि करीब नौ दशक पूर्व गांव के पशुओं में अज्ञात बीमारी फैल गई थी, जिससे कई मवेशी काल कलवित हो गए। उस वक्त चिकित्सा की इतनी व्यवस्था नहीं थी। तब ग्रामीणों ने वहां तपस्या करने वाले नागाजी महाराज के नाम से विख्यात जसरथगिरी महाराज से इस बीमारी से छुटकारा दिलाने की गुहार लगाई। इस पर जसरथगिरी ने वर्ष में एक बार माघ मास के शुक्ल पक्ष में तीन दिन तक रात्रि में जागरण तथा गांव के मुख्य मार्ग बंद कर गांव के चारों तरफ निर्वस्त्र अवस्था में गांव के चारों ओर दौड़ते हुए धार देते परिक्रमा लगाने की सलाह दी। तब खंडप कस्बे के वाशिंदों ने महाराज की बताई गई बात उपाय के रूप में मानी और बीमारी से छुटकारा पाते हुए राहत ली। इसके बाद आज तक प्रतिवर्ष यह आस्था भरी परंपरा निरंतर चली रही है।
यह है परंपरा
परंपराके अनुसार पांच युवक मंगलवार रात्रि में हनुमानजी के मंदिर में पवित्र किए ठंडे जल से स्नान कर हनुमानजी की पूजा-अर्चना कर निवस्त्र होकर हनुमानजी का नाम लेते हुए ज्योत, गदा, तलवार के साथ कलश में दूध, घी, पंचामृत पानी मिलाकर दौड़ते हुए पूरे गांव के चारों तरफ धार लगाते हुए परिक्रमा देते हैं। यह परिक्रमा महज 8 से 12 मिनट में पूरी हो जाती है। दौड़ के दौरान चार-पांच लोगों की समूह में टोलियां बनाकर मुख्य मार्गों पर ग्रामीण खड़े रहते हैं कि कोई बाहरी व्यक्ति या वाहन चालक दौड़ लगाने वाले युवकों को निवस्त्र देखकर डर या घबरा नहीं जाए।
खंडप. पत्थर कंटीली झाड़ियां डालकर बंद किया गया मुख्य मार्ग।
इस बार भी परंपरा का निर्वहन
प्रतिवर्षकी भांति इस वर्ष भी परंपरा का निर्वहन कस्बेवासियों की ओर से बड़े ही धूमधाम से किया गया। बीते रविवार को कस्बे में प्रवेश के सभी द्वार बंद कर दिए गए। वहीं रविवार से कस्बे में स्थित तीनों मंदिरों पर रात्रि जागरण का आयोजन शुरू हुआ, जो मंगलवार रात्रि तक निरंतर चला। तीन दिन तक रात्रि जागरण आयोजन के साथ धार देकर चौथे दिन बुधवार को कस्बे में प्रवेश के सभी द्वार खोल दिए गए, इसके बाद गांव में वाहनों का आवागमन भी शुरू हो गया।
तीन दिन के आयोजन में कस्बे का हर नागरिक इस परंपरा से वाफिक होते हुए बड़ी आस्था के साथ इसे निभाते हैं और वाहन लेकर आने वाले लोगों से प्रवेश द्वार के बाहर वाहन खड़े कर कस्बे में प्रवेश का आग्रह करते हैं। बाहरी लोग भी कस्बेवासियों की अटूट आस्था में सहयोग करते हैं।
दशकों से चली रही इस परंपरा का निर्वहन खंडप कस्बे में हर साल माघ मास के शुक्ल पक्ष में किसी एक रविवार से मंगलवार तक बड़ी आस्थापूर्वक होता है। इन तीन दिनों में कस्बे के सभी प्रवेश मार्ग बड़े-बड़े पत्थर कंटीली झाड़ियों से बंद कर दिए जाते हैं वाहन का प्रवेश गांव में वर्जित रहता है। इन तीन दिनों में रात्रि में कस्बे में स्थित हनुमानजी का मंदिर, नागाजी महाराज की बगीची रामदेव मंदिर पर भजन संध्या का आयोजन होता है, जिसमें सभी ग्रामीण बड़ी आस्था के साथ भाग लेते हैं। बुजुर्गों के अनुसार यह परंपरा कस्बे में करीब 90 से चल रही है। नागाजी महाराज के नाम से विख्यात जसरथगिरी महाराज के बताए मार्ग पर खंडप कस्बे के वाशिंदे आज भी चल रहे हैं।
परंपरा के पीछे की मान्यता कुछ ऐसी
ग्रामीणरामसिंह भाटी, नरेंद्रसिंह बालावत, बाबूलाल जोशी, मूलसिंह सोढ़ा, देवाराम, मदनसिंह भाटी आदि ने बताया कि दशकों से चली रही इस परंपरा के पीछे मान्यता यह है कि करीब नौ दशक पूर्व गांव के पशुओं में अज्ञात बीमारी फैल गई थी, जिससे कई मवेशी काल कलवित हो गए। उस वक्त चिकित्सा की इतनी व्यवस्था नहीं थी। तब ग्रामीणों ने वहां तपस्या करने वाले नागाजी महाराज के नाम से विख्यात जसरथगिरी महाराज से इस बीमारी से छुटकारा दिलाने की गुहार लगाई। इस पर जसरथगिरी ने वर्ष में एक बार माघ मास के शुक्ल पक्ष में तीन दिन तक रात्रि में जागरण तथा गांव के मुख्य मार्ग बंद कर गांव के चारों तरफ निर्वस्त्र अवस्था में गांव के चारों ओर दौड़ते हुए धार देते परिक्रमा लगाने की सलाह दी। तब खंडप कस्बे के वाशिंदों ने महाराज की बताई गई बात उपाय के रूप में मानी और बीमारी से छुटकारा पाते हुए राहत ली। इसके बाद आज तक प्रतिवर्ष यह आस्था भरी परंपरा निरंतर चली रही है।
यह है परंपरा
परंपराके अनुसार पांच युवक मंगलवार रात्रि में हनुमानजी के मंदिर में पवित्र किए ठंडे जल से स्नान कर हनुमानजी की पूजा-अर्चना कर निवस्त्र होकर हनुमानजी का नाम लेते हुए ज्योत, गदा, तलवार के साथ कलश में दूध, घी, पंचामृत पानी मिलाकर दौड़ते हुए पूरे गांव के चारों तरफ धार लगाते हुए परिक्रमा देते हैं। यह परिक्रमा महज 8 से 12 मिनट में पूरी हो जाती है। दौड़ के दौरान चार-पांच लोगों की समूह में टोलियां बनाकर मुख्य मार्गों पर ग्रामीण खड़े रहते हैं कि कोई बाहरी व्यक्ति या वाहन चालक दौड़ लगाने वाले युवकों को निवस्त्र देखकर डर या घबरा नहीं जाए।
खंडप. पत्थर कंटीली झाड़ियां डालकर बंद किया गया मुख्य मार्ग।
इस बार भी परंपरा का निर्वहन
प्रतिवर्षकी भांति इस वर्ष भी परंपरा का निर्वहन कस्बेवासियों की ओर से बड़े ही धूमधाम से किया गया। बीते रविवार को कस्बे में प्रवेश के सभी द्वार बंद कर दिए गए। वहीं रविवार से कस्बे में स्थित तीनों मंदिरों पर रात्रि जागरण का आयोजन शुरू हुआ, जो मंगलवार रात्रि तक निरंतर चला। तीन दिन तक रात्रि जागरण आयोजन के साथ धार देकर चौथे दिन बुधवार को कस्बे में प्रवेश के सभी द्वार खोल दिए गए, इसके बाद गांव में वाहनों का आवागमन भी शुरू हो गया।
तीन दिन के आयोजन में कस्बे का हर नागरिक इस परंपरा से वाफिक होते हुए बड़ी आस्था के साथ इसे निभाते हैं और वाहन लेकर आने वाले लोगों से प्रवेश द्वार के बाहर वाहन खड़े कर कस्बे में प्रवेश का आग्रह करते हैं। बाहरी लोग भी कस्बेवासियों की अटूट आस्था में सहयोग करते हैं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें